राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

समाचार में

  • राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस (NPRD) प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है, ताकि पंचायती राज प्रणाली की स्थापना का स्मरण किया जा सके।

परिचय

  • यह दिवस 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 की स्मृति में मनाया जाता है, जो 1993 में प्रभावी हुआ और पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
  • ये प्रावधान भारतीय संविधान के भाग IX में सम्मिलित हैं, जो ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर पर स्थानीय निकायों को सशक्त बनाकर बुनियादी लोकतंत्र को सुदृढ़ करते हैं।

पंचायती राज प्रणाली का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

  • भारत में पंचायती राज की जड़ें प्राचीन ग्राम सभाओं जैसे सभा और समिति में हैं, जो स्थानीय शासन का संचालन करती थीं।
  • ब्रिटिश शासन के दौरान केंद्रीकृत प्रशासन के कारण यह प्रणाली कमजोर हो गई।
  • स्वतंत्रता के बाद विकेन्द्रीकृत शासन को बढ़ावा देने हेतु बलवंत राय मेहता समिति (1957) का गठन हुआ, जिसने त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली की अनुशंसा की।
  • इसे सर्वप्रथम 1959 में राजस्थान में लागू किया गया।
  • संवैधानिक आधार 73वें संशोधन अधिनियम द्वारा मिला, जिसने पंचायती राज संस्थाओं को अनिवार्य बनाया और संविधान के अनुच्छेद 243–243O में समाहित किया।

पंचायती राज संस्थाओं की संरचना

  • पंचायती राज प्रणाली विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें सत्ता केंद्र और राज्य सरकारों से निर्वाचित ग्राम प्रतिनिधियों को हस्तांतरित होती है।
  • इसकी त्रिस्तरीय संरचना है:
  1. ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर) – जल आपूर्ति, स्वच्छता, सड़क प्रकाश और ग्राम अधोसंरचना जैसी स्थानीय प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ।
  2. ब्लॉक पंचायत (मध्य स्तर) – ग्रामों के बीच विकास का समन्वय और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन।
  3. जिला पंचायत (जिला स्तर) – ब्लॉकों में विकास गतिविधियों का एकीकरण, योजना निर्माण और संसाधन आवंटन।

क्या आप जानते हैं?

  • ग्राम सभा किसी ग्राम के सभी पंजीकृत मतदाताओं का निकाय है और यह बुनियादी स्तर पर प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सबसे सशक्त रूप है।
    • यह पंचायती राज की स्थायी संस्था है, परंतु त्रिस्तरीय संरचना का हिस्सा नहीं है।
    • इसके अधिकार और कार्य राज्य कानूनों द्वारा परिभाषित हैं।
    • यह विकास योजनाओं को अनुमोदित करती है, व्यय की निगरानी करती है, पारदर्शिता सुनिश्चित करती है और ग्रामवासियों को निर्णय-निर्माण में भागीदारी का अवसर देती है।

पंचायती राज प्रणाली को सशक्त बनाने हेतु पहलें

  • स्वामित्व योजना (SVAMITVA Scheme) – 24 अप्रैल 2021 को प्रारंभ की गई इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को कानूनी स्वामित्व अधिकार प्रदान करना है।
    • इसके अंतर्गत ड्रोन और GIS तकनीक द्वारा आबाद ग्राम क्षेत्रों का मानचित्रण कर संपत्ति कार्ड जारी किए जाते हैं।
  • सभा सार (SabhaSaar) – यह एक एआई-आधारित उपकरण है जो ग्राम सभा बैठकों की कार्यवाही स्वतः तैयार करता है। इससे मैनुअल कार्यभार कम होता है और निगरानी प्रणाली सुदृढ़ होती है।
  • ई-ग्रामस्वराज (eGramSwaraj) – पंचायतों के लिए एक उपयोगकर्ता-अनुकूल वेब पोर्टल है जो योजना निर्माण, प्रगति रिपोर्टिंग, वित्तीय प्रबंधन और परिसंपत्तियों की निगरानी में पारदर्शिता लाता है।
    • यह PFMS (सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली) से जुड़ा है, जिससे राज्यों से पंचायती राज संस्थाओं को केंद्रीय वित्त आयोग की निधियों का ऑनलाइन हस्तांतरण संभव होता है।
  • ग्राम ऊर्जा स्वराज (Gram Urja Swaraj) – ई-ग्रामस्वराज के अंतर्गत एक डिजिटल डैशबोर्ड है, जो ग्राम पंचायत स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा परिसंपत्तियों की वास्तविक समय में निगरानी करता है।
  • मेरी पंचायत (Meri Panchayat App) – राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित एकीकृत मोबाइल गवर्नेंस प्लेटफ़ॉर्म है।
    • इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाना, बेहतर शासन, जवाबदेही और नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करना है।
  • राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) – यह एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है जिसका लक्ष्य क्षमता निर्माण, संस्थागत विकास और अधोसंरचना समर्थन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त करना है।
  • मॉडल महिला-हितैषी ग्राम पंचायत (MWFGP) – यह पहल स्थानीय शासन में महिलाओं के नेतृत्व को सशक्त बनाने के लिए है।
    • इसका उद्देश्य समावेशी और लैंगिक-संवेदनशील पंचायतों का निर्माण करना है, जो महिलाओं की भागीदारी, सुरक्षा, अधिकार एवं सशक्तिकरण सुनिश्चित करें।
  • सशक्त पंचायत–नेतृ अभियान – निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (EWRs) के नेतृत्व, संचार और निर्णय-निर्माण कौशल को बढ़ाने हेतु यह पहल शुरू की गई है।
    • इसका फोकस वास्तविक शासन स्थितियों में व्यावहारिक और सहभागितापूर्ण सीखने पर है।
  • मॉडल युवा ग्राम सभा (MYGS) – युवाओं को बुनियादी लोकतंत्र में जोड़ने हेतु यह पहल शुरू की गई है।
    • इसे विद्यालयी शिक्षा और साक्षरता विभाग तथा जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ मिलकर लागू किया गया है। 
    • इसमें जवाहर नवोदय विद्यालय और एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के कक्षा 9 और 10 के छात्र सम्मिलित होते हैं।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों का विस्तार अधिनियम, 1996 (PESA Act) – यह अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज प्रावधानों का विस्तार करता है। इससे ग्राम सभा-आधारित शासन को सुदृढ़ किया गया है।
    • यह अधिनियम 10 राज्यों के 77,000 से अधिक ग्रामों में लागू है।
    • यह 45 पूर्ण और 63 आंशिक जिलों में विकेन्द्रीकृत, सामुदायिक निर्णय-निर्माण को बढ़ावा देता है।
    • यह अधिनियम पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में लागू होता है, जैसे आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश।
    • अधिकांश राज्यों ने PESA नियम अधिसूचित कर दिए हैं, केवल ओडिशा को छोड़कर।

प्रगति

  • पंचायती राज संस्थाएँ (PRIs) तीव्र डिजिटल परिवर्तन से गुजर रही हैं, जिससे बुनियादी स्तर पर पारदर्शिता, दक्षता और जवाबदेही में वृद्धि हुई है।
  • अब 95% से अधिक गाँवों में 3G/4G कनेक्टिविटी उपलब्ध है, जिससे अंतिम छोर तक सेवा वितरण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
  • कॉमन सर्विस सेंटर (CSCs), जिन्हें 6.5 लाख से अधिक ग्राम स्तरीय उद्यमियों द्वारा संचालित किया जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं को आसानी से सुलभ बना रहे हैं।
  • लगभग 2.18 लाख ग्राम पंचायतों में से करीब 2.14 लाख पहले से ही जुड़ी हुई और सेवा-तैयार हैं, जो ग्राम स्तर पर डिजिटल समावेशन की सुदृढ़ प्रगति को दर्शाता है।

पंचायती राज संस्थाओं के समक्ष चुनौतियाँ

  • राजकोषीय निर्भरता – पंचायती राज संस्थाएँ राज्य और केंद्र सरकार से प्राप्त हस्तांतरणों पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता और योजना लचीलापन सीमित होता है।
  • क्षमता की कमी – प्रशिक्षित कर्मियों, योजना विशेषज्ञता और डिजिटल साक्षरता की कमी से कार्यान्वयन की गुणवत्ता कमजोर होती है।
  • राज्य-स्तरीय प्रतिरोध – कई राज्य सरकारें नौकरशाही नियंत्रण के माध्यम से PRI की स्वायत्तता को सीमित करती हैं, जिससे विकेन्द्रीकरण की संवैधानिक भावना प्रभावित होती है।
  • सामाजिक प्रभुत्व – जातिगत पदानुक्रम, लैंगिक पक्षपात और स्थानीय शक्ति संरचनाएँ प्रतिनिधित्व को विकृत करती हैं, भले ही संवैधानिक आरक्षण विद्यमान हो।
  • कमजोर जवाबदेही – अपर्याप्त लेखा-परीक्षण तंत्र और सामाजिक लेखा-परीक्षण की कम पहुँच से पारदर्शिता घटती है और संसाधनों का दुरुपयोग होता है।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • पंचायती राज प्रणाली ने भारत में स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाकर बुनियादी लोकतंत्र को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है। तथापि, वित्तीय निर्भरता, सीमित क्षमता और कमजोर जवाबदेही जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।
  • वित्तीय स्वायत्तता को बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि पंचायतें स्थानीय संसाधनों को एकत्रित और प्रबंधित कर सकें।
  • क्षमता निर्माण को निरंतर प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और पेशेवर सहयोग के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का अधिक उपयोग योजना और निगरानी में सुधार ला सकता है।
  • समावेशी शासन सुनिश्चित करना होगा, ताकि आरक्षण से परे हाशिए पर रहने वाले समूहों की सार्थक भागीदारी हो सके।
  • जवाबदेही तंत्र को स्वतंत्र लेखा-परीक्षण, सामाजिक लेखा-परीक्षण और नागरिक चार्टर के माध्यम से सुदृढ़ किया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ बेहतर अभिसरण से पंचायतें अधिक प्रभावी एवं एकीकृत ग्रामीण विकास को आगे बढ़ा सकती हैं, जो विकसित भारत की परिकल्पना के अनुरूप है।

स्रोत :PIB

 

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